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भारतीय जनता पार्टी की सरकार की उलटी गिनती अब शुरू हो चुकी है। जहां एक ओर सरकार द्वारा लागू किए गए तीन कृषि कानूनों का चौतरफा विरोध हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर एक और मुद्दे की चिंगारी को अब फिर से हवा मिलनी शुरू हो गई है। वो मुद्दा है एसवाईएल यानी सतलुज यमुना लिंक नहर का। ये मसला आज का नहीं बल्कि बरसों पुराना है। सतलुज यमुना लिंक नहर से हरियाणा के हिस्से का पानी हासिल करने के लिए प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की इकाई ने अब मोर्चा संभाल लिया है। 

पहले से की गई घोषणा के अनुसार शनिवार को प्रदेश के विभिन्न जिलों में पार्टी वर्कर्स का उपवास शुरू हो चुका है। 

बताते चलें कि इस प्रदर्शन का अलग-अलग तरीके से विरोध भी हो रहा है। 

अगर बातकी जाए फरीदाबाद की तो यहां करीब 11 बजे किसानों ने पुलिस की तरफ से लगाए गए बैरीकेट्स उखाड़कर नारे लगाते हुए वहां भी पहुंच गए, जहां भाजपाई धरने पर बैठकर उपवास कर रहे थे। 

किसानों की रफ्तार यहीं नहीं थमी, उन्होंने टेंट में घुसकर भाजपा के पोस्टर तक फाड़ डाले। इसके बाद नेताओं के साथ मंच पर ही बैठकरनारे लगाने शुरू कर दिए।

यह था भाजपाइयों का ऐलान

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के हरियाणा प्रादेशिक नेतृत्व की तरफ से कई दिन पहले ही 19 दिसंबर को संघर्ष शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था। इसमें कहा गया था कि हर जिले में पार्टी के नेता और कार्यकर्ता 5 घंटे के लिए जिला मुख्यालय पर धरना देंगे। 

इस दौरान उपवास भी रखा जाएगा। शनिवार को इसी ऐलान के मुताबिक पार्टी नेतृत्व का प्रदर्शन शुरू हो चुका है। कहीं सुबह 10 बजे से तो कहीं 11 बजे से ये लोग धरने पर बैठ गए हैं। इसके बाद शाम को हर जिले के डिप्टी कमिश्नर को मांगपत्र सौंपा जाएगा।

आ रही हैं प्रतिक्रियाएं भी, विरोधी बोले- यह सही वक्त नहीं

उधर, इस हरियाणा भाजपा के इस प्रदर्शन के खिलाफ कई प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गई हैं। पंजाब के अमृतसर से कांग्रेस सांसद गुरजीत सिंह औजला समेत कई नेताओं ने कहा है कि यह सही वक्त नहीं है। एक ओर कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब-हरियाणा के किसान एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दिल्ली की दहलीज पर 24 दिन से धरने पर बैठे हैं, दूसरी ओर हरियाणा के भाजपाई दोनों राज्यों के किसानों को बांटने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा हरियाणा की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी सैलजा की मानें तो भाजपाई सिर्फ नौटंकी कर रहे हैं।

इस मसले को लेकर बीते सोमवार को हरियाणा के भाजपाई सांसदों और विधायकों ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर से भी मुलाकात की थी। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से कहा कि हरियाणा के किसानों को उनके हिस्से का सतलुज-यमुना नहर से तत्काल पानी दिलाया जाए, क्योंकि सतलुज-यमुना नहर हरियाणा की जीवन रेखा है। 

उन्होंने कहा कि हरियाणा के हिस्से का 19 लाख एकड़ फीट पानी काफी साल से नहीं मिल रहा है। पंजाब से यह पानी हरियाणा को मिला बहुत जरूरी है। यही नहीं सांसदों-विधायकों ने ऊपरी यमुना पर बनने वाले तीन बांध लखवार, किसाऊ और रेणुका के कार्य में भी तेजी लाने की मांग की।

किसानों के आंदोलन के बीच सांसदों-विधायकों ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर से सोमवार को मुलाकात कर एसवाईएल के पानी का मुद्दा उठाया।

सांसदों-विधायकों ने केंद्रीय मंत्री से कहा कि हरियाणा के किसानों को उनके हिस्से का सतलुज-यमुना नहर से तत्काल पानी दिलाया जाए। क्योंकि सतलुज-यमुना नहर हरियाणा की जीवन रेखा है। उन्होंने कहा कि हरियाणा के हिस्से का 19 लाख एकड़ फीट पानी काफी साल से नहीं मिल रहा है। पंजाब से यह पानी हरियाणा को मिला बहुत जरूरी है। यही नहीं सांसदों-विधायकों ने ऊपरी यमुना पर बनने वाले तीन बांध लखवार, किसाउ और रेणुका के कार्य में भी तेजी लानेे की मांग की।

सरकार लिखित में देने को तैयार : केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए कृषि सुधार कानूनों के लिए आभार जताया। सांसदों-विधायकों ने कहा कि किसान संगठनों द्वारा कृषि कानूनों में जो संशोधन सुझाए गए थे, उन्हें सरकार ने स्वीकार कर लिया है। केंद्र सरकार ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद जारी रहेगी। इसके लिए वे लिखित में देने को तैयार हैं। इसी तरह मंडी व्यवस्था जारी रहने का आश्वासन भी दिया गया है।

पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज यमुना के जल-बँटवारे को लेकर विवाद पिछले 50 साल से भी ज्यादा समय से गहराया हुआ है। पंजाब सरकार का कहना है कि राज्य में जल का स्तर बहुत कम है। गोया हम सतलुज-यमुना नहर के जरिए हरियाणा को पानी देते हैं तो पंजाब में पानी का संकट पैदा हो जाएगा। वहीं हरियाणा सरकार सतलुज के पानी पर अपना अधिकार जता रही है। 

वर्ष 2016 में जब एसवाईएल के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया था जिससे ये विवाद और भी ज्यादा गहरा गया। न्यायालय ने पंजाब सरकार को बड़ा झटका देते हुए, सतलुज का पानी हरियाणा को देने का आदेश दे दिया। इसके चलते पंजाब में राजनीति गरमा गई और पंजाब के सभी 42 विधायकों ने इस मुद्दे पर अपने इस्तीफे विधानसभा सचिव को सौंप दिये। विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता चरणजीत सिंह चन्नी भी शामिल हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस सांसद और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

हालांकि सिंह की गिनती ऐसे सांसदों में है, जो संसद कम ही जाते हैं। सिंह ने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर राज्य के हितों की सुरक्षा नहीं कर पाने का आरोप भी लगाया है। सतलुज-यमुना जोड़ नहर के निर्माण को लेकर भी पंजाब में विवाद चरम पर है।एसवाईएल का इतिहास

दरअसल सतलुज-यमुना विवाद की बुनियाद 1 नवम्बर 1966 को पंजाब के पुनर्गठन के साथ ही पड़ गई थी। इस पुनर्गठन के तहत ही हरियाणा स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। किन्तु उत्तराधिकारी राज्यों अर्थात पंजाब व हरियाणा के बीच नदियों के पानी का बँटवारा सुनिश्चित नहीं किया गया। केवल केन्द्र सरकार की एक अधिसूचना के जरिए कुल पानी 7.2 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) में से 3.5 एमएएफ पानी हरियाणा को आबंटित कर दिया गया। इस पानी को पंजाब से हरियाणा लाने के लिये सतलुज-यमुना नहर (एसवाईएल) बनाने का फैसला हुआ। इस नहर की कुल लम्बाई 212 किलोमीटर है।

हरियाणा ने अपने हिस्से में आने वाली 91 किमी नहर का निर्माण समय-सीमा पूरा कर लिया गया, लेकिन पंजाब ने अपने हिस्से की 122 किमी लम्बी नहर का निर्माण अभी तक नहीं किया है। इसके उलट पंजाब सरकार ने मार्च 2016 में नहर निर्माण के लिये जो जमीन अधिग्रहण की थी, उसे वापस करने का फैसला ले लिया।

मसलन पानी देने की बात जड़ से ही खत्म कर देने की कोशिश कर दी गई थी। इस पर हरियाणा ने शीर्ष न्यायालय की देहरी पर दस्तक दी। न्यायालय ने पंजाब को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। लेकिन अब इस मामले पर अन्तिम फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने नहर का निर्माण निर्बाध गति से पूरा करने का फैसला सुना दिया है।

हालांकि इसी तरह के रोड़े अटकाए जाने के दौरान अदालत 1996 और 2004 में भी यही फैसला सुना चुकी है। इस दौरान कांग्रेस और अकाली दल भाजपा गठबन्धन की सरकारें पंजाब में रहीं, लेकिन नहर के निर्माण को किसी ने गति नहीं दी। मसलन एक तरह से न्यायालय के आदेश की अवमानना की स्थिति बनाई जाती रही।

नहर का निर्माण शुरू करने और हरियाणा को पानी दिये जाने के स्पष्ट आदेश के बावजूद पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबन्धन सरकार फैसले के विरोध में है। सरकार का कहना है, ‘नदी का पानी हमारा कानूनी अधिकार है, जो वैश्विक रूप से मान्य रिपेरियन सिद्धान्त पर आधारित है। यह सिद्धान्त कहता है कि नदी का पानी उस राज्य और देश या उन राज्यों और देशों का है, जहाँ से सम्बन्धित नदी बहती है। पंजाब खुद प्यासा है, इसलिये पानी की एक बूँद भी पंजाब से बाहर नहीं जाएगी। साथ ही नहर के निर्माण में एक ईंट भी नहीं लगाने दी जाएगी।’ यह बयान अदालत की अवमानना तो है ही, इससे यह भी पता चलता है कि आसन्न चुनाव के मद्देनजर पंजाब की मौजूदा सरकार को केवल वोट नजर आ रहे हैं।

प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने अपने कार्यकाल में इस मुद्दे को सामूहिक समन्वय से सुलझाने की कोशिश की थी। 31 दिसम्बर 1981 को उन्होंने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई। बैठक में रावी-व्यास नदियों में अतिरिक्त पानी की उपलब्धता का भी अध्ययन कराया गया।

इस समय पानी की उपलब्धता 158.50 लाख एमएएफ से बढ़कर 171.50 लाख एमएएफ हो गई थी। इसमें से 13.2 लाख एमएएफ अतिरिक्त पानी पंजाब को देने का प्रस्ताव मंजूर करते हुए तीनों राज्यों ने समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये। समझौते में यह शर्त भी रखी गई कि पंजाब अपने क्षेत्र में आने वाली सतलुज-यमुना जोड़ नहर का निर्माण करेगा। इन मुद्दों से जुड़े प्रकरण भी सुप्रीम कोर्ट से वापस ले लिये गए।

कार्य को गति देने की दृष्टि से इन्दिरा गाँधी ने 8 अप्रैल 1982 को पटियाला जिले के कपूरी गाँव के पास नहर की खुदाई के काम का भूमि-पूजन किया। किन्तु तभी सन्त हरचंद सिंह लोंगोवाल की अगुवाई में अकाली दल ने नहर निर्माण के खिलाफ धर्म-युद्ध छेड़ दिया। नतीजतन पूरे पंजाब में इस नहर के खिलाफ वातावरण गरम होता चला गया।

इसी दौरान पंजाब उग्रवाद की चपेट में आ गया और इन्दिरा गाँधी की हत्या उनके ही निवास स्थल पर सुरक्षाकर्मियों ने कर दी। राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 24 जुलाई 1985 को राजीव गाँधी और अकाली दल प्रमुख सन्त लोंगोवाल ने राजीव-लोंगोवाल समझौते पर हस्ताक्षर किये।

समझौते की शर्तों में अगस्त 1986 तक नहर का निर्माण पूरा करने की शर्त पर सहमति बनी। दूसरी तरफ जल-बँटवारे को लेकर पंजाब और हरियाणा के दावों पर सहमति व विचार-विमर्श करने के लिये सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में प्राधिकरण गठित करने का निर्णय लिया गया। प्राधिकरण ने 1987 में रावी-व्यास के अतिरिक्त पानी को पंजाब व हरियाणा दोनों ही राज्यों को देने का तार्किक फैसला लिया। किन्तु इस फैसले की अधिसूचना पंजाब सरकार के राजपत्र में जारी नहीं की गई।

राजीव-लोंगोवाल समझौते के तहत सरदार सुरजीत सिंह बरनाला के मुख्यमंत्री रहते हुए नहर का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया। काम ने गति भी पकड़ ली, लेकिन पाकिस्तान से निर्यात उग्रवाद की छाया में चल रहे पंजाब में उग्रवादियों ने नहर निर्माण में कार्यरत 35 मजदूरों की एक साथ हत्या कर दी। काम फिर से शुरू होने की कारगार कोशिशें हो ही रही थीं कि नहर निर्माण से जुड़े दो इंजीनियरों की भी हत्या उग्रवादियों ने कर दी। इसके बाद काम लगभग बन्द हो गया।

1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हुकुम सिंह ने केन्द्र सरकार की मदद से नहर का अधूरा कार्य किसी केन्द्रीय एजेंसी से कराने की पहल की। सीमा सड़क संगठन को यह काम सौंपा भी गया, किन्तु शुरू नहीं हो पाया। मार्च 2016 में तो पंजाब ने सभी समझौतों को दरकिनार करते हुए नहर के लिये की गई 5376 एकड़ भूमि के अधिग्रहण को निरस्त करने का ही फैसला ले लिया।

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