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भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने किसानों के लिए तीन अध्यादेश राज्य सभा और विधानसभा में पारित किए गए बिलों को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मंजूरी मिलने के बाद कानून की शक्ल मिल गई थी। इसी को लेकर किसानों और सरकार के बीच एक जंग छिड़ गई है जो कब जाकर खत्म होगी यह तो अभि भविष्य के गर्भ में है।

बहरहाल किसानों और सरकारों के बीच छिड़ी इस जंग का फायदा उठाने में विपक्षी पार्टियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है जिसमें से मुख्य रूप से है कांग्रेस। मुद्दा चाहे कोई भी हो कांग्रेस के सभी नेता उस मुद्दे को अपना मानने का छलावा तो ऐसा करते हैं कि आईना भी इनका छल न पकड़ पाए। सरकार कह रही है कि किसानों को इन तीनों कानूनों को स्वीकार कर लेना चाहिए ये उनके ही पक्ष में हैं। तो वहीं दूसरी ओर इन कानूनों ने सरकार के लिए करो या मरो की स्थिति पैदा कर दी है। चलिए आपको विस्तार से बताते हैं कि आखिर क्या है ये पूरा मामला।

तीन अध्यादेश क्या हैं?
लोकसभा के मानसून सत्र में किसानों के हितों में तीन बिल (विधेयक) पारित हुए जो अब कानून बन चुके हैं। कृषि और किसानों से संबंधित इन तीनों अहम कानूनों पर राजनीति गरमा गई है। पंजाब से लेकर महाराष्ट्र तक कई दल इन कानूनों का विरोध करने में लगे हुए हैं। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी का दाहिना हाथ कही जाने वाली शिरोमणी अकाली दल ने भी भाजपा से नाता तोड़ दिया। शिअद की हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा तक दे डाला। आईए आपको विस्तार से बताते हैं कि कौन से हैं वो तीन कानून और क्यों हो रहा है इनका विरोध।
1- कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020
इस कानून के मुताबिक किसान मनचाही जगह पर अपनी फसल बेच सकते हैं। बिना किसी रफ़कावट दूसरे राज्यों में भी फसलों को बेचा और खरीदा जा सकता है। इसके मायने ये हैं कि ।च्डब् (।हतपबनसजनतम च्तवकनबम डंतामज ब्वउउउपजजमम) के दायरे से बाहर भी फसलों की खरीद-बिक्री संभव है। इसके अलावा फसल बिक्री पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। ऑनलाइन बिक्री की भी अनुमति इसके तहत दी जाएगी। इससे किसानों को अच्छे दाम मिलेंगे।
2- मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020
देशभर में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है। फसल खराब होने पर उसके नुकसान की भरपाई किसानों को नहीं बल्कि एग्रीमेंट करने वाले पक्ष या कंपनियों को करनी होगी। किसान कंपनियों को अपनी कीमत पर फसल बेचेंगे। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और बिचौलिया राज खत्म होगा।
3- आवश्यक वस्तु संशोधन बिल: आवश्यक वस्तु अधिनियम को 1955 में बनाया गया था। अब खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू जैसे कृषि उत्पादों पर से स्टॉक लिमिट हटा दी गई है। बहुत जरूरी होने पर ही इन पर स्टॉक लिमिट लगाई जाएगी। ऐसी स्थितियों में राष्ट्रीय आपदा, सूखा जैसी स्थितियां शामिल हैं। प्रोसेसर या वैल्यू चेन पार्टिसिपेंट्स के लिए ऐसी कोई स्टॉक लिमिट लागू नहीं होगी। उत्पादन स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन पर सरकारी नियंत्रण खत्म होगा।
इसलिए हो रहा है विरोध
किसान और व्यापारियों को इन कानूनों से एपीएमसी मंडियां खत्म होने की आशंका साफ नजर आ रही है। कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 में कहा गया है कि किसान अब एपीएमसी मंडियों के बाहर किसी को भी अपनी उपज बेच सकता है, जिस पर कोई शुल्क नहीं लगेगा, जबकि एपीएमसी मंडियों में कृषि उत्पादों की खरीद पर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग मंडी शुल्क और अन्य उपकर हैं। इसके चलते आढतियों और मंडी के कारोबारियों को डर है कि जब मंडी के बाहर बिना शुल्क का कारोबार होगा तो कोई मंडी आना नहीं चाहेगा। किसानों को इस बात का भी डर सता रहा है कि नए कानून के बाद एमएसपी पर फसलों की खरीद सरकार बंद कर देगी। दरअसल, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुधार) विधेयक 2020 में इस संबंध में कोई व्याख्या नहीं है कि मंडी के बाहर जो खरीद होगी वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे के भाव पर नहीं होगी।

इस मामले में नीति आयोग का पक्ष
नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने लोकसभा में कृषि क्षेत्र से संबंधित विधेयकों के पारित होने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ये किसानों को सशक्त बनाएंगे और कृषि के भविष्य पर इनका व्यापक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि यह एक ऐतिहासिक दिन है। उनका मानना है कि ये कानून न केवल किसानों को सशक्त बनाएंगे बल्कि ये किसानों और व्यापारियों के लिए एक समान व मुक्त पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करेंगे, जिससे अनुकूल प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ावा मिलेगा और व्यापार की ट्रांसपिरेंसी में सुधार होगा। उनका मानना है कि किसान पहली बार अपने खेतों से सीधे बिक्री कर सकते हैं। किसानों के भीतर व्यापारियों के शोषण के जोखिमक े बिना उद्यम स्वतंत्रता की भावना उत्पन्न होगी।

Kisan News Update

इन कानूनों के बारे में एग्री एक्सपर्ट का कहना है कि किसानों के लिए ये कानून काफी फायदेमंद हैं। उनका कहना है कि इनके लागू होने से किसानों की आय बढ़ेगी। बाजार से बिचौलिये दूर होंगे और किसानों को उनकी फसल का वाजिब भाव मिल सकेगा। आने वाले दिनों में ग्रामीण भारत(गांव) निवेश का हब बनेगा। कृषि विधेयकों के अमल में आने से खेती-किसानी के क्षेत्र में निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ेगा। मगर इसके लिए राज्य सरकारों को भी कृषि क्षेत्र में निवेश का माहौल बनाना होगा।

हालांकि, देश के जिन राज्यों में एमएसपी पर खरीद होती है। किसान इस बात से चिंतित हैं कि आनेे वाले दिनों में खरीद बंद हो जाएगी। इसके अलावा राज्य सरकारों को ये चिंता खाए जा रही है कि किसान मंडियों के बाहर फसल बेचेंगे जिससे उनका राजस्व घटेगा। यही कारण है कि इन कानूनों का इतनी बड़ी संख्या में पंबाज और हरियाणा के किसान विरोध पर उतर आए हैं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के मुताबिक उनकी अहम मांगों में से एक है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीद को अपराध घोषित करे और एमएसपी पर सरकारी खरीद लागू रहे।’’

एमएसपी पर खुद प्रधानमंत्री ट्वीट कर कह चुके हैं ‘मैं पहलेे भी कह चुका हूं और एक बार फिर कहता हूं, एमएसपी की व्यवस्था जारी रहेगी, सरकारी खरीद जारी रहेगी। हम यहां अपने किसानों की सेवा के लिए हैं। हम अन्नदाताओं की सहायता के लिए हर संभव प्रयास करेंगे और उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करेंगे।’ ये बयान प्रधान मंत्री ने ट्वीट के जरिए 20 सितम्बर को दिया था। मगर वे इस बात को बिल में लिखकर देने को तैयार नहीं हैं। इसके पीछे सरकार का तर्क ये है कि इसके पहले के कानूनों में भी लिखित में ये बात कहीं नहीं थी। इसलिए नए बिल में इसे शामिल नहीं किया गया है। दरअसल एमएसपी पर सरकारी खरीद चालू रहे और उससे कम पर फसल की खरीद को अपराध की श्रेणी में लाना इतना आसान भी नहीं है जितना किसानों को लग रहा है। सरकार के लिए ऐसा करना मुश्किल क्यों है इससे पहले ये जान लें कि एमएसपी क्या है और ये तय कैसे होती है?

किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की व्यवस्था लागू की गई है। अगर कभी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है। जिससे किसानों को नुकसान न हो। किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है। भारत सरकार का कृषि मंत्रलय, कृषि लागत और मूल्य आयोग (कमिशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइजेस) की अनुशंसाओं के आधार पर एमएसपी तय करता है। इसके तहत अभी 23 फसलें किसानों से खरीदी जा रही हैं।

इनमें धान, गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का, मूंग, मूंगफली, सोयाबीन, तिल और कपास जैसी फसलें शामिल हैं। एक अनुमान के अनुसार देश में केवल 6 फीसदी किसानों को एमएसपी मिलता है, जिनमें से सबसे ज्यादा किसान पंजाब-हरियाणा के हैं। यही कारण है कि नए कृषि कानूनों का विरोध भी इन इलाकों में ज्यादा हो रहा है। चलिए जानते हैं कि कृषि कानूनों से अब तक क्या बदला है। एमएसपी को लेकर किसानों की चिंता के पीछे कुछ वजहें हैं। सरकार ने अब तक ऐसा कोई लिखित में ऑर्डर जारी नहीं किया है कि फसलों की सरकारी खरीद जारी रहेगी। सरकार और किसानों के बीच जो बातचीत हो रही है वो अभी तक केवल मौखिक तौर पर ही है। इसीलिए किसान इतने चिंतित हैं। गौरतलब है कि सरकारी खरीद जारी रहने का ऑर्डर कृषि मंत्रलय नहीं बल्कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रलय की ओर से आना है।

इसका दूसरा कारण है रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड राज्य सरकारों को न देना। केंद्र सरकार तीन फीसद का ये फंड हर वर्ष राज्य सरकारों को देती थी। लेकिन इस वर्ष केंद्र सरकार ने ये फंड देने से साफ इनकार कर दिया है। इस फंड का इस्तेमाल ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर (जिसमें कृषि सुविधाएं भी शामिल हैं) बनाने के लिए किया जाता था। नए कृृषि कानून बनने के बाद ये दो महत्वपूर्ण बदलाव किसानों को सामने दिख रहे हैं।

फसलों की एक किसान नेता का कहना है कि अगर एमएसपी पर खरीद का प्रावधान सरकार कानून में जोड़ भी दे तो आखिर कानून का पालन किया कैसे जाएगा? एमएसपी हमेशा एक ‘फेयर एवरेज क्वालिटी’ के लिए होता है। यानी कि फसल की निश्चित की गई क्वालिटी होगी तो ही उसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा। अब कोई फसल गुणवत्ता के मानकों पर ठीक बैठती है या नहीं इसे तय कैसे किया जाएगा? जो फसल उन मानकों पर खरी नहीं उतरेगी उसका क्या होगा? ऐसी स्थिति में सरकार कानून में किसानों की मांग को शामिल कर भी ले तो कानून को अमल में लाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। दूसरी वजह के बारे में किसान नेता का कहना है कि सरकार को कई कमेटियों ने सिफारिश दी है, कि गेहूं और धान की खरीद सरकार को कम करना चाहिए, इससे संबंधित शांता कुमार कमेटी से लेकर नीति आयोग की रिपोर्ट सरकार के पास है।

सरकार इसी उद्देश्य के तहत काम भी कर रही है। आने वाले दिनों में ये खरीद कम होने वाली है यही डर किसानों को सता रहा है। ऐसे में जो फसल सरकार खरीदेगी या नहीं, खरीदेगी तो कितना और कब खरीदेगी जब ये तक तय नहीं हो पाया है तो लिखित में पहले से एमएसपी वाली बात कानून में कैसे कह सकती है।

अंदाजा ये लगाया जा रहा है कि भविष्य में सरकारें कम खरीदेंगी तो जाहिर सी बात है कि किसान निजी कंपनियों को फसलें बेचेंगे। निजी कंपनियां अपना मुनाफा पहले देखेंगी। वो चाहेंगी कि एमएसपी से कम पर खरीद की जाए। इसी कारण सरकार निजी कम्पनियों पर ये शर्त थोपना चाह रही है। इसमें सरकार के भी कुछ हित जुड़े हैं और निजी कम्पनियों को भी इससे दिक्कतें होने की पूरी पूरी संभावना है। अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी एमएसपी पर सरकार क्यों हिचक रही है इसे ऐसे समझिए।

इसके लिए दो शब्दों के बारे में जान लेना आपके लिए आवश्यक है। पहला शब्द है ‘मोनॉपली’। इसका मतलब है कि जब बेचने वाला एक ही हो और उसकी ही मनमानी चलती हो, तो वो मनमानी कीमत वसूल करता है। दूसरा शब्द है ‘मोनॉप्सनी’ यानी कि खरीदने वाला एक ही हो और उसकी मनमानी चलती है।

इसके मायने ये हैं कि वो जिस कीमत पर सामान खरीदना चाहे वो खरीद सकता है। भाजपा सरकार ने जो नए कानून पास किए हैं उससे आने वाले दिनों में कृषि क्षेत्र में ‘मोनॉप्सनी’ बनने वाली है। कुछ एक कंपनियां ही कृषि क्षेत्र में अपना एक गठजोड़ बना लेंगी तो वो जो कीमत तय करेगी उसी पर किसानों को सामान बेचना होगा। अगर एमएसपी का प्रावधान कानून में जोड़ दिया गया तो किसानों पर निजी कंपनियों का वजूद खतरे में पड़ सकता है। इसका नतीजा ये भी हो सकता है कि ये कंपनियां फसलें कम खरीदेंगी। सरकार के पास कोई रास्ता नहीं है जिससे वो एमएसपी पर पूरी फसल खरीदने के लिए निजी कंपनियों को बाध्य कर सके। वो भी तब जब सरकार किसानों की फसल कम खरीदने का मन पहले से ही बना कर बैठी है। यदि ऐसा हुआ तो अन्नदाता के लिए मुसीबत बढ़ सकती है। वो अपनी फसल किसको बेचेंगे। ऐसे में हो सकता है कि एमएसपी तो दूर, उनकी लागत भी न निकल पाए। अगर कानून में एमएसपी का प्रावधान जोड़ दिया तो इससे जुड़े हर मुकदमे में तीन पक्ष शामिल होंगे एक तो सरकार, दूूसरा किसान और तीसरा निजी कंपनी।

क्या इसमें पोलिटिकल कनेक्शन है?
क्या केंद्र सरकार की ओर से पारित कृषि कानून के विरोध के पीछे कोई राजनीतिक चाल है? इस बात का अभी तक कोई ठोस जवाब नहीं मिल सका है लेकिन पंजाब समेत कुछ राज्यों में चल रहे किसान आंदोलन से कुछ ऐसे संकेत मिल रहे हैं।
क्या राजनीतिक दल उपलब्ध करवा रहे हैं रसद सामग्रीघ्
हर मुद्दे पर सत्ता पक्ष विपक्षी दलों के नेताओं को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ता है। ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई किसान इतने मजबूर हो गए हैं कि उनके पास प्रदर्शन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है? किसान प्रदर्शनों में शामिल लोग बड़ी संख्या में रसद सामग्री और ओढ़ने-पहनने का इंतजाम करके दिल्ली की ओर बढ़ चुके हैं। ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं कि इसके लिए प्रदर्शनकारी किसानों को पीछे से राजनीतिक दलों की ओर से पूरी मदद की जा रही है।

विवाद का हल क्या है?
अनुमान के मुताबिक भारत में 85 फीसदी छोटे किसान हैं, जिनके पास खेती के लिए पांच एकड़ से छोटी ज़मीन है। एक किसान नेता के अनुसार एमएसपी से नीचे खरीद को अपराध घोषित करने पर भी विवाद खत्म होने की संभावना नहीं दिख रही है। विवाद को खत्म करने का एक ही रास्ता है कि इन तीनों कानूनों को वापस ले लिया जाए। फिलहाल कानून वापस लेने पर सरकार राज़ी होती नहीं दिख रही है। वहीं एक और किसान नेता कहते हैं कि सरकार किसानों को डायरेक्ट फाइनेंशियल सपोर्ट दे जैा किसान सम्मान निधि के जरिए किया जा रहा है। दूसरा उपाय है कि किसान दूसरी फसलें भी उगाएं जिनकी मार्केट में डिमांड है। अभी केवल गेहूं, धान, धान उगाने पर किसान ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। वे दलहन और ऑयल सीड पर किसान कम ध्यान देते हैं। इससे मार्केट का डायनमिक्स बना रहेगा।

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