किसान आंदोलन का रियलिटी चेक
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नमस्कार। मेरा नाम है राम महाजन और आप देख रहे हैं हरियाणा मीडिया न्यूज़।
ठंड का मौसम।
घना कोहरा।

चाय की चुस्कियां लेते आप और हम।
अगर हम इस कड़कड़ाती ठंड में 2 मिनट के लिए भी बाहर निकल जाएं तो नानी याद आने लगे। कसम से।
लेकिन इस हाडमांस कंपा देने वाली सर्दी में भी ये अन्नदाता, ये भारत भाग्य विधाता, दिल्ली की सड़कों पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार की जिद की ओस की चादर ओढे़ बैठे हुए हैं।

क्या ये यहां किसी के कहने पर आए हैं? क्या इन्हें किसी ने कोई लालच दिया है?

नहीं जनाब। ये सब धरती पुत्र अपना हक लेने यहां आए हैं। कहते हैं, अगर घी सीधी उंगली से न निकले तो उसे टेढ़ा करना पड़ता है। ये किसान इसी फॉर्मूले पर चल रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ये फॉर्मूला कामयाब होगा। 

सरकार इनके हौसले के आगे झुकेगी और ये तीनों कृषि कानून वापस लेगी। आपकी इस बारे में क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बताइएगा। 
वैसे आपको बता दें, आज किसान आंदोलन का 28वां दिन है। जैसे हर जगह का कुछ न कुछ मशहूर होता है ठीक उसी तरह दिल्ली की सर्दी भी पूरे भारत में मशहूर है। पिछले 4 हफ्तों से दिल्ली की हाड कपा देने वाली ठंड में राजधानी के अलग-अलग बॉर्डरों पर किसानों का प्रदर्शन जारी है । 

दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों को देश के तमाम राज्यों के किसानों का साथ मिल चुका है। आज किसान आंदोलन में अपनी भागीदारी निभाने महाराष्ट्र स्थित नासिक के किसान संगठन ने दिल्ली की ओर तेज़ी से अपने कदम बढ़ा लिए हैं। 
केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे किसान अपनी मांग मनवाने और इन कानूनों को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के लिए डटे हुए हैं।

अब एक मजेदार बात। इस आंदोलन में किसानों की आवाज़ को बुलंद करने के लिए सैकड़ों पत्रकार न जाने कहां से पैदा हो गए हैं। अब इसे टीआरपी का खेल न कहें तो भला और क्या कहें। वो कहावत है न लोहा गरम हो तो हथौड़ा मार दो। बस यही काम इन दिनों कुछ पत्रकार कर रहे हैं। 
इन दिनों किसानों का मुद्दा खूब भुना हुआ है तो इनका बस यही काम है कि कैसे न कैसे हम अपने चैनल को आगे बढ़ाएं, माइक उठाएं, किसानों के पीछे दौड़े-दौड़े जाएं और टीआरपी लाएं। 

माना कि किसान अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं और उनकी आवाज़ को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया के जरिए लोगों और सरकार तक पहुंचाने का काम आप लोग कर रहे हैं ये बहुत अच्छी बात है। 

मगर ई कउन बात हुआ भई कि आप केवल किसानों के पास ही जाएं। उन्हीं की सुनें। तनिक मंत्री लोगन के भी चक्कर वक्कर काट लियो भाऊ साहिब। किसान तो अपना दर्द ही बयान करेगा इससे ज्यादा वो कर भी क्या सकते हैं। 
लेकिन जब आप मंत्री के पास जाएंगे, तनिक दो चार कड़वे कड़वे सवालों का घूसा उनके लाला जैसे पेट पर मारेंगे तभी तो अंदर की बात निकल कर आएगी।

हर मंत्री दूसरी सरकार पर, अपनी भड़ास निकालेगा।
इसी बहाने कम से कम, सच तो बोल डालेगा।
न तंग करो किसानों को, इन मंत्रियों का सच दिखाओ।
ठंड से बचकर घर में दुबके हर मंत्रि को बहर लाओ।।

बेचारे हर मंत्री ठंड में अपनी चदरिया ओढ़े, ब्लोवर चलाकर खर्राटे भरने में लगे हुए हैं।

माइक लेकर इनके भी दरवाजों तक पहुंच जाओ, और नींद से इन्हें जगाओ।
जरा अपनी गाड़ी का पहिया इन मंत्रियों के निवास पर भी घुमाओ। इनसे भी दो चार सवाल पूछ आओ।

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